Guru Dev - Shankaracharya Swami Brahmananda Saraswati -
speaks on ‘Diwali’
(from 'Shri Shankaracharya Vachanamrit Bhag - 1')

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शङ्कराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती 

दीवाली मानते हो तो हृदय में ज्योति जगा‍ओ

 

एक बार हृदय में भगवान को प्रकट कर लो तो सदा के लिये सुखी हो जा‍ओगे। आप लोग दीवाली मानते हो तो अपने हृदय में आत्मज्योति जगा। बाहर तो दीपक जलाना तो ठीक है परम्परा से चला आता है  पर एक बार अपने हृदय में भगवान को प्रकट कर लो तो सदा के लिये सुखी हो जा‍ओगे।

 

आजकल लोग दीवाली के दिन जु‍आ खेलने हैं नाना प्रकार के भ्रष्टाचार करते हैं यह ठीक नहीं। दीवाली जु‍आ खेलने के लिये तो नहीं है। इसको कालरात्रि कहते हैं। इस दिन तो अपने इष्ट के भजन धान में ही समय को बिताना चाहिये। दीवाली मनाने की सार्थकता इसी में है कि अन्तर्दीप जला‍ओ। अपने अन्दर प्रकाश मिल गया तो फिर संसार की जिन वासना‍ओं के पीछे रात दिन परेशान रहते हो वह स्वतः छूट जायेंगी  आनन्द तो परमात्मा में ही है  आत्मानन्द का जिसको एक बार अनुभव हो गय वह फिर विषयानन्द में कैसे फण्सेगा  आप लोग विषयों में मन को अधिक न लगाकर भगवान की तरफ लगा‍ओ  भगवान अपना लेंगे तो फिर यह जन्म जन्मान्तर की दरिद्रता मिट जायेगी।

 

मनुष्य सुख की खोज में इधर उधर विषयों में धक्का खाता फिरता है। विषयों में तो सुख् है नहीं। क्षण मात्र के लिये उसकी जिस विषय में व्ऱ्इत्ति एकाग्र हो जाती है  उसमें वह सुख का अनुभव करता है। यथार्थ में यदि विषयों में सुख हो तो फिर वहाण् से वृत्ति का उत्थान नहीं होना चाहिये  पर ऐसा नहीं होता। किसी को यदि दैवयोग से एक लक्ष रुपया मिल जाय तो थोड़ी देर के लिये वह आनन्द विभोर हो जाता है। उसे बड़ी प्रसन्नता होती है पर फिर वह रुपया हमेशा उसके पास पड़ा रहता है लेकिन उसको उसके पाने के समय का सा सुख फिर नहीं मिलता यदि यथार्थ में उसमें आनन्द ही चाहता है और आनन्द की ही खोज में वह विषयों में वह विषयों में जाता है  वहाण् उसको आनन्द मिलता तो फिर दुसरे विषय में जाता है।

 

विषयों में जो क्षणिकानन्द का अनुभव होता है वह इसलिये कि उतनी देर के लिये उसमें वृत्ति स्थिर हो जाती है। वृत्ति के स्थिर होने में ही आनन्द है पर मनुष्य यह समझता है कि विशय से हमें सुख मिल रहा है। कुत्ता सुखी अस्थि को चर्बण करता है  उसके चर्बण करने से उसका मुख कट जाता हैं रक्त निकलने लगता है। वह यह समझता है कि हड्डी से ही रक्त निकल रहा है उसका स्वाद लेकर वह उसका और चर्बण करता है। इसी तरह विषयों में तो सुख है नहीं पर क्षणमात्र के लिये उसमें वृत्ति एकाग्र हो जाने के कारण हो सुखाभास होता है  उसमें संसारी लोग यही समझते हैं कि विषयों में सुख मिल रहा है।

 

जितना अधिक मन स्थिर होता है उतना ही अधिक आनन्द का भी अनुभव होने लगता है। इसलिये मन को स्थिर करने की आवश्यकता है। मन की चंचलता उपासना से दूर होती है। उपासना करते करते जब मन सर्वथा एकाग्र हो जाता है तो निरन्तर भगवद् आनन्द का अनुभव होने लगता है।

 

जनक ज्ञानी थे उनकी विदेह कहा। एक बार राजा जनक कथा सुन रहे थे तो यह प्रसंग आया कि पुष्प को मर्दन करने में चाहे विलम्ब हो जाय पर यदि उच्च कोटि का गुरु हो साधन सम्पन्न शिष्य हो तो उसको ज्ञान कराने में विलम्ब नहीं हो सक्त। पर शिष्य को साधन सम्पन्न होना चाहिये  साधनहीन को ज्ञान नहीं होता। जब जनक ने यह सुना तो कहा कथा बन्द कर दो और अब हमें ज्ञान करा‍ओ  पर वह वक्ता ज्ञान न करा सका। उसको कारागार में बन्द कर दिया गया। अनेकों लोग जनक को ज्ञानोपदेश करने के लिये आये पर ज्ञान न करा सकने पर सबको कारागार में बन्द करवा दिया गया।

 

अन्त में अष्टावक्रजी आये। शरीर में आठ ही तो अंग हैं  वह आठों अंग से टेड़्दे थे। द्वार पर आये कहा - हम जनक को उपदेश करने आये हैं। लोगों ने कहा चले जा‍ओ नहीं तो जेल में बन्द कर दिये जा‍ओगे। अष्टावक्र को बुलवाया  उनसे भी वही प्रश्न किया कि हमको ज्ञान का उपदेश करो। अष्टावक्र जी ने कहा कि पहले पात्र बनो तो ज्ञान हो सकता है। लिखा है -

अशिष्याय न दातव्यं

अपुत्राय न दातव्यं

सम्यक् परिख़्श्याय दातव्यं।

अशिश्य को उपदेश नहीं करना चाहिये  अपुत्र को उपदेश नहीं करना चाहिये। शिष्य हो या पुत्रा हो उसकी भी सम्यक् परीक्षा लेकर ही उपदेश करना चाहिये। अतः पहले शिष्य बनो तब ज्ञानोपदेश के अधिकारी होगे।

 

जनक जी ने पूछा फिर क्या करें  अष्टावक्रजी ने कहा तन  धन अर्पण करो। जनक ने सब अर्पण कर दिय। जब अपने पास कुछ रहा ही नहीं तो जनकजी को समाधि लग ग‍ई क्योंकि अब को‍ई स्थान ही रहा जहाण् मन जाता सब कुछ गुरु को अर्पण हो चुका था  मन भी गुरु को अर्पण कर दिया था।

 

अष्टावक्र जी ने पूछा तु कौन है  पर जनक ने कुछ उत्तर नहीं दिया। परमार्थ वस्तु तो अभेद है  उत्तर भी क्या देते  फिर जनक ने कहा आज्ञा हो तो मैं उत्तराखण्ड चला जा‍उण्। अष्टावक्र ने कहा उत्तराखण्ड कैसे आ‍ओगे शरीर पर तो हमारा अधिकार है।

 

इस तरह अष्टावक्र जी ने जनक को आत्मानन्द का अनुभव कराया। जनक अष्टावक्र संवाद तो बहुत है। मतलब यह है कि मनुष्य को जब परमानन्द का अनुभव हो जाता है तो फिर इस तुच्छानन्द में उसकी वृत्ति ही नहीं जाती। मनुष्य जीवन का मूल्य यही है कि इसी जीवन में भगवान की प्राप्ति हो जाय।

 


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